Wednesday, 4 July 2018

पंच प्रयाग (केदारनाथ और बद्रीनाथ)

33 डिग्री तापमान से 3 डिग्री तापमान, 900 फ़ीट समुन्द्र तल से 12000 फ़ीट की ऊन्चाई, 1300 कि०मी० के इस यात्रा वृतान्त में आपका स्वागत है। देवभूमि में स्थित पंचप्रयागों से होते हुये अतिप्रसिद्ध केदारनाथ तथा बद्रिनाथ की इस यात्रा का प्रारम्भ होता है 3 यात्रियो के साथ 13 जुलाई(सावन माह) गुरुवार रात 9 बजे। माँ गंगा(हरिद्वार) के दर्शन व शितल जल की कल-कल ध्वनी से देवभूमि में प्रवेश किया, यात्रा का प्रथम पड़ाव 14 जुलाई प्रातः 4:30 बजे ऋषीकेश था। हर बार की तरह इस बार भी हमारा पड़ाव मेरे मनभावन घाट त्रिवेणी घाट पर ही था।
त्रिवेणी धाम पर बनी कृष्ण और अर्जुन की एक मोहक कलाकृति
जितनी बार भी मैं इस घाट पर जाता था, तब यही इच्छा होती थी कि गंगा जी की इतनी तीव्र धारा को किसी दिन पार कर दूसरे छोर तक जाऊं पर न तैर पाने के कारण मन को सान्त्वना देने के सिवाय और कोई चारा ना था। पिछली बार जब ऋषीकेश आया तब भी यही इच्छा उतपन्न हूई, और वही तीव्र बहाव, वही बच्चे जो हर बार की तरह मुझे इस पार से उस पार जाते दिखते थे सब वैसा ही था। पर इस बार मुझे भी तैरना आता था, अभी भी तीव्र बहाव के कारण हिम्मत नहीं हो रही थी, बहुत मन बनाकर महादेव को याद किया और कूद गया तैरता हुआ उस पार निकल गया फिर पार करने के गौरव के साथ खिलखिलाता हुआ वापस तैर आया। 
ये बात तो हुई पिछली बार की चलिये अब आते हैं मूल यात्रा वृतान्त पर, ऐसा ही कुछ मन में इस बार भी था पर मेरी सारी आशाओं पर पानी तब फ़िर गया जब मैं गंगा जी के निकट गया और देखा की इस बार का प्रवाह अचम्भित नहीं अथवा भयभीत करने वाला है। ये सावन का माह है और अब बारिश के कारण प्रवाह में वेघ और पानी कि मात्रा बहुत अधिक है, गंगा जी से आशीष लिया और अपनी यात्रा में आगे प्रस्थान किया। अब यात्रा सुगम समतल राहों पर नहीं, किन्तु बाह्य हिमालय जिन्हें शिवालिक पर्वत श्रेणी कहा जाता है उन पर थी, कहते हैं ये हिमालय की सबसे युवा पर्वत श्रेणी है। एक पर्वत से दूसरे पर्वत चढ़ते-उतरते हम पन्चप्रयागों में प्रथम देवप्रयाग पहुंचे, यहां रुक कर मैं आप लोगों का प्रयाग शब्द से परिचय करा देना उचित समझता हूँ। प्रयाग का अर्थ होता है "मिलने का स्थान" जहाँ किन्हीं दो नदियों का सन्गम हो या मिलना हो उस स्थान को हमारे शाश्त्रों में प्रयाग कहा है। इस जगह दो नदियों का संगम होता है एक अलकनन्दा और दूसरी भागीरथी कहा जाता है जब राजा भगीरथ ने गंगा को पृथ्वी पर उतरने को मना लिया तो ३३ करोड़ देवी देवता भी उनके साथ पृथ्वी पर उतरे जिन्होंने यहीं अपना आवास यहीं बनाया इसीलिये इस जगह को देवप्रयाग कहा जाता है, यहीं से भागिरथी और अलकनन्दा के संगम के बाद पवित्र नदी गंगा जी का उद्भव हुआ है।
आगे अगस्त्य्मुनी से होते हुये हम दूसरे प्रयाग "रूद्रप्रयाग" पहुंचते हैं, यह आज के आधुनिक उत्तराखण्ड का एक जिला भी है। अब आप नाम से समझ ही गये होंगे कि यहां भी दो नदियों का संगम है, अलकनन्दा तथा मन्दाकिनी दो नदियाँ का यहां अतिसुन्दर संगम देखने को मिलता है। इन्हीं दो नदियों के उद्गम स्थान पर दो सुप्रसिद्ध धाम जिनकी यात्रा पर हम निकले हैं स्थित हैं, मन्दाकिनी पर स्थित है भोले बाबा का केदारनाथ, दूसरी नदी अलकनन्दा पर स्थित है नर-नरायाण जी का मन्दिर बद्रिनाथ। नारद ऋषी ने यहां शिव जी का रूद्र नाम से मन्दिर बनवाया था, तभी से इस स्थन का नाम रुद्रप्रयाग हो गया। इस जगह से हम मन्दाकिनी नदी के साथ साथ उसके प्रवाह के विपरीत बढ़ते रहे। 
अगला प्रयाग आता है सोनप्रयाग यहां पर बासुकी और मन्दाकिनी नदियाँ आपस में मिलती है। इस स्थान का भी अत्यधिक धार्मिक महत्व है ऐसा माना जाता है कि सोनप्रयाग के जल का स्पर्श मात्र ही बैकुण्ठ धाम की प्रथम सीढ़ी है। सोनप्रयाग में ही हमारी Biometric हाजिरी दर्ज की गयी एक आगे जाने के टोकन के साथ ये बताया गया कि शाम ३ बजे के बाद किसी को भी यात्रा प्रारंभ करने कि अनुमति नहीं है। बारिश भी होने लगी थी तापमान लगभग ९ डिग्री था आगे बढ़ने की सम्भावना भी नहीं थी, १४ जुलाई को शाम ४ बजे से अगली प्रातः तक भरपूर आराम के बाद, यहां से हम अपना वाहन आगे नहीं ले जा सके मार्ग दुर्गम तथा सन्करा होने के कारण सार्वजनिक परिवहन के प्रयोग से हमको गौरीकुण्ड तक पहुंचाया गया।
मंदाकिनी की दूध से रंग की तीव्र धाराओं को देखते हुए
यहां गौरीकुण्ड से बाबा जी के कृपादर्शन हेतु हमको पैदल यात्रा का आनन्द लेते हुये जाना है। एक अचम्भित करने वाली बात आपको यहां बतादूं, चार धाम की यात्रा इतने ठण्डे स्थान पर है किन्तु तब भी यहां आपको हर तीर्थ स्थान पर एक प्राकृतिक गर्म जल का स्त्रोत अवश्य मिलेगा, प्रकृति ने एसी व्यवस्था की है, ठण्ड में तप्त जल से नहाने का आनन्द लिया और आगे पैदल यात्रा प्रारंभ की बाबा जी के दर्शन हेतु। यात्रा थी कुछ १८-१९ कि०मी० की पहला झरना देखा तो दिल खुश हो गया सोचा तस्वीर लेलूं आगे मिले न मिले पर प्रकृति ने गलत साबित कर दिया और अनगिनत झरने राह में दिखे, यात्रा का आनन्द लेते हुये और प्रकृति के अतुलनीय सौन्दर्य को देखता हुआ, अचम्भित होता हुआ, रुकता-चलता हुआ मैं राम्बाड़ा पुल तक आया जहां से कहते हैं, असली चढ़ाई प्रारंभ होती है। पुल पार करते ही सोंचा थोड़ा आराम कर लिया जाये इतने साथ वाले जो पीछे छूट गये थे, वे भी आ जायेंगे। व्यवस्था और सरकार द्वारा निर्मित कई शरणस्थल भी बीच बीच में बनाये गये, पर मेरा मानना है जब आप प्रकृति के बीच हैं तो उसके और पास जाने के लिए मानव निर्मित वस्तुओं से दूर जाइये। मैने भी ऐसा ही किया पुल से नीचे उतर कर मन्दाकिनी नदी के किनारे पड़ी बड़ी शिलाओं और चट्टानों से होता होआ पुल से दूर एक चट्टान पर सामान रखा और दूसरी पर लेटकर आखें बन्द करके प्रकृति को महसूस करने लगा वाह! क्या आनन्द था। मुझे ये अहसास तक नहीं हुआ कि मैं अभी १२ कि०मी० पहाड़ पर पैदल ऊपर चढ़ कर आया हूँ। कुछ देर यूं ही आराम के बाद आगे बढ़ा हलकी हलकी फ़ुहार भी पड़ने लगी थी।
अब जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा था दृश्यों की सुन्दरता उतनी ही बढ़ती जाती थी, शब्दों में उल्लेख नहीं हो सकता फ़िर भी कोशिश की है, जिस पहाड़ पर हम थे उस पर थोडा समतल स्थान था बीच में कहीं कहीं पर बड़े पत्थर दिख रहे थे जगह जगह रंग बिरंगे फ़ूलों कि क्यारियां थी, दोनों तरफ़ पहाड़ बीच में वादि जहाँ से नदी के बहने की मध्म आवाज़ आरही थी। पीछे वाले पहाड़ों पर नज़र डाली तो लगा मैं बदलों से ऊपर हूँ, बारिश भी बारिश जैसी नहीं थी ऐसा लग रहा था पानी वाले बादल से सीधे स्पर्श हो रहा हो थोड़ी देर वहां एक चट्टान पर बैठा कुछ चित्र भी लिये। 
बाबा केदारनाथ
मैं बाबा जी से बस २ कि०मी० के दूरी पर था, आगे तज़ी से बढ़ा और प्रशासन के द्वारा निर्मित कोटेज दिखने लगे और बढ़ा तो मन्दिर की चोटी के दर्शन हो गये बाबा जी को याद करता हुआ और आगे मन्दाकिनी नदी का पुल पार किया तो दोनों तरफ़ प्रसाद की सजी दुकानों के बीच मन्दिर प्रत्यक्ष था, मेरे आनन्द की कोई सिमा नहीं थी। बहुत अधिक भीड़ न थी पण्डो को छोड़ दूं तो २५-३० लोग ही होंगे मन्दिर के निकट, पहले सोंचा आराम से मन्दिर को निहार लूं इतने कानों में कहीं से ध्वनी पड़ी कि मन्दिर ३ बजे बन्द होगा समय देखा २:३० बजे थे, बिना देरी किये वस्त्र बदले, प्रसाद की थाली और जल लिये भगवान के जलाभिषेक के लिये एक पण्डे के साथ आगे बढ़ा पूजा अर्चना की यहाँ देसी घी से अभिषेक किया जाता है। मन्दिर के अन्दर की बनावट सुन्दरता अपने आप में ही एक कथा है, जिसे कहा नहीं जा सकता पर उसका आनन्द दर्शन करके उसकी पौराणिकता और अहसास को महसूस करके किया जा सकता है।

वापस नीचे पहुंचकर गाड़ी को हमने सोनप्रयाग की पार्किन्ग से निकाला और बिना रुके। पहाड़ों से उतरती मन्दाकिनी के अतितीव्र अविरल प्रवाह के साथ साथ चलती सड़क पर सरलता के साथ गाड़ी में बैठे-बैठे पिछ्ले दिन की पहाड़ों पर करी पद यात्रा को याद किया। पहड़ों से उतरने में ज्यादा समय नहीं लगता। हम मन्दाकिनी और अलकनन्दा के संगम स्थल रुद्रप्रयाग तक पहुंचे। यहां से हमारी यत्रा ने पूर्व की ओर एक मोड़ लिया अब मन्दाकिनी का साथ छोड़ कर हम अलकनन्दा के साथ परन्तु उसके प्रवाह से विपरीत ऊपर बढने लगे। यहां से अलकनंदा नदी और बद्रीनाथ सड़क दो समानांतर रेखाओ की तरह कभी न मिलने पर भी सदैव साथ साथ बढ़ती दिखती है| करनप्रयाग से उत्तर पूर्व की और बढ़ते हुए 20 किमी उपरान्त हम पंच प्रयागों में से एक नंदप्रयाग पहुँचते है, अलकनंदा नदी पर यह जगह है जहां अलकनंदा एवं नंदाकिनी नदियों का मिलन होता है। ऐतिहासिक रूप से शहर का महत्व इस बात में है कि यह बद्रीनाथ मंदिर जाते तीर्थयात्रियों का पड़ाव स्थान होता है साथ ही यह एक महत्वपूर्ण व्यापारिक स्थल भी है। ऐसा कहा जाता है कि स्कंदपुराण में नंगप्रयाग को कण्व आश्रम कहा गया है जहां दुष्यंत एवं शकुंतला की कहानी गढ़ी गयी। स्पष्ट रूप से इसका नाम इसलिये बदल गया क्योंकि यहां नंद बाबा ने वर्षों तक तप किया था।
यात्रा का अत्यंत आनंदमयी अहसास हमारे मन की सभी चिंताओं को इस तरह छुपा चुका था जैसे मात्र एक दीप के जलने से कक्ष प्रकाशमयी हो जाता है। अब हमारे तन मन में निराशा, कष्ट, वेदना का अन्धकार नहीं था, था तो बस उत्साह, हर्ष, उल्लास और अतुलनीय नए दृश्यों को देखने की चाहजैसे जैसे हम आगे बढ़ रहे थे ऊपर जाने वाले रास्ते की दुर्गमता बढ़ती जा रही थी। हम नंदप्रयाग से 60किमी और आगे बढ़ चुके थे अब जो जगह आई इसके बारे में मैंने सूना बहुत था। जोशीमठ या ठीक कहूँ तो "ज्योतिषपीठ", जोशीमठ शब्द ज्योतिर्मठ शब्द का अपभ्रंश रूप है जिसे कभी-कभी ज्योतिषपीठ भी कहते हैं। इसे वर्तमान 8वीं सदी में आदि शंकराचार्य ने स्थापित किया था। उन्होंने यहां एक शहतूत के पेड़ के नीचे तप किया और यहीं उन्हें ज्योति या ज्ञान की प्राप्ति हुई। यहीं उन्होंने शंकर भाष्य की रचना की जो सनातन धर्म के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ग्रंथों में से एक है। वर्त्तमान मे इस शहर का अधिकांशतः भाग छावनी के रूप में परिवर्तित कर दिया गया है। जिसकी वजह से अध्यात्म एवं साहसिकता का एक रोमांचक मिश्रण बनता है और मेरे जैसे यात्रियों को स्फूर्ती प्रदान करता है। ज्योतिर्मठ से बद्रीनाथ का रास्ता मात्र 45 किमी है परन्तु पहाड़ो पर बने इन रास्तो का सही मापन किमी से नहीं करते। इनकी दुर्गमता आपको ज्यादा तेज़ रफ़्तार पकड़ने नहीं देती। केदारधाम को जाने वाले रास्ते से अगर तुलना करूँ तो यहां का रास्ता ह्रदयगति को तेज़ करने वाला है, जिसे खतरनाक बना देती है धुंध और कभी भी आने जाने वाली बरसात कभी भी सरक कर गिरजाने वाले पहाड़ और छोटे छोटे पत्थर पहाड़ों से आते जाते ही रहते हैं। कोइ पहाड़ रेतीला है कोइ चट्टानों वाला कहीं पर झरनों से गिरने वाले पानी के कारण सड़क पर फिसलन है तो कहीं सड़क है ही नहीं। बद्रीनाथ पहुँचने से पहले हनुमान चट्टी से होते हुए एक पैदल मार्ग हेमकुंट साहिब को चला जाता है। हेमकुंट साहिब के जाने वाले रास्ते से एक और राह निकलती है जो "फूलों की घाटी" को जाती है। इन दोनों जगहो को देखने का दिल तो बहुत था परन्तु पैदल चढ़ाई करने के लिए शरीर में दम और समय कम जैसे हीले-हवालों के साथ मन को सांत्वना दी और बद्रीनाथ की राह पकड़ी यहीं बद्रीनाथ के लिए हमारी गाड़ी और हमारा नाम भी दर्ज किया गया। आगे बढ़ने का रास्ता और ज्यादा कठिन होता जा रहा था हर 200 मी पर ज.सी.बी. की व्यवस्था थी जो की रास्तों के खराब होते ही तुरन्त मरम्मत के लिए तत्पर थी। बद्रीनाथ तक पहुंचते पहुंचते अनेको सुन्दर नज़ारों को मन मे संजो लिया था।
ऊपर आते आते सर्दी इतनी ज्यादा बढ़ गयी थी के गाड़ी से निकलने के कुछ पलो बाद ही शरीर में स्पंदन होने लगा। जल्दी से अपना लिहाफ निकाला और ओढ़ने के बाद विचार करने लगे की अब क्या करना चाहिए। यहाँ की आबो हवा सर्द थी और आभास ये हो रहा था कि मानो हम पहाड़ो पर नहीं एक समतल जगह पर है और हमारे चारो तरफ पहाड़ों की चोटी है। 
सीमान्त ग्राम माना 
कुछ ही दूरी पर दूर-दूर तक फैले भारतवर्ष की एक सीमा समाप्त होती है और आखिरी गांव "माना" पड़ता है। भारत का एक सिरा समाप्त हो जाता है, और हमारे मन में उस गांव को देखने की उमंगो का आरम्भ हो जाता है। वापस गाड़ी में बैठ कर माना तक जाने वाली सामने दिख रही सड़क पर गाड़ी बढ़ने लगती है। कुछ 5 किमी चलते ही, 10500 फ़ीट की ऊचाई पर एक तरफ अलकनंदा का प्रवाह दूसरी तरफ 180 घरों का बसा छोटा सा एक सुन्दर गांव है "माना" जहाँ आपको छोटे-छोटे काफी शाप नज़र आएंगे यहां की 600 लोगो की सारी जनसंख्या सर्दियों में नीचे के इलाको में चली जाती है। सर्दियों के मौसम में ये सारा इलाका बर्फ से ढक जाता है। मंदिर के कपाट बंद हो जाते हैं शायद ही आसपास कही कोइ जीवन का प्रमाण मिलता हो पर ऐसी विषम परिस्थिती और ऐसे अगम्य स्थान पर भी कोइ मिलता है तो वो हमारे देश के जवान है। इसी विचार के साथ उन आर्मी के बंकरो और बैरकों को नमन करते हुए हमने अपनी कार को बद्रीधाम तरफ की मोड़ लिया। पर नाथ के समक्ष जाने से पहले मेरा नहाना अति आवश्यक हो गया था, क्योकि पिछले दो दिनों से नहाया नहीं था माना की जगह ठंडी थी पर नहाने से मात्र ऊपरी शरीर ही नहीं अपितु मन भी स्वच्छ हो जाता है। नहाने के लिए एक स्वच्छ जगह ढूंढी, ये आभास था की जल ठंडा तो होगा ही और था भी पानी से शरीर भीगते ही सुन्न होगया बाहर आकर   देखा तो नीला पड़ गया। जल्दी जल्दी कपडे पहने और बहार मित्रों के साथ मिलकर मंदिर की ओर बढ़े।
मैं पहले ही वर्णित कर चुका हूँ की यहाँ हर धार्मिक श्थल के पास एक गरम जल का श्रोत है, पर उस समय मुझे ये नहीं पता था कि  इस वर्ष भर ठंडी रहने वाली जगह पर शीतल जल से बहती अलकनंदा नदी के पास ही एक गरम जल का श्रोत है, जहाँ से हर पल उबलता हुआ जल निकलता है। केदार में आई आपदा के कारण जो कुंड नाश हो गया था वैसा ही कुंड हमें यहां देखने को मिला। वस्तुतः कह रहा हूँ मेरा विश्वास करिये जल इतना गरम है की आप बिना ठंडा जल मिलाए नहा नहीं सकते। 

अब आपका परिचय बद्रीनाथ से कराते हैं, ब्रह्माजी के दो बेटे थे। उनमें से एक का नाम था दक्ष। दक्ष की सोलह बेटियां थी। उनमें से तेरह का विवाह धर्मराज से हुआ था। उनमें एक का नाम था श्रीमूर्ति। उनके दो बेटे थे, नर और नारायण। दोनों बहुत ही भले, एक-दूसरे से कभी अलग नहीं होते थे। नर छोटे थे। वे एक-दूसरे को बहुत चाहते थे। अपनी मां को भी बहुत प्यार करते थे। एक बार दोनों ने अपनी मां की बड़ी सेवा की। माँ खुशी से फूल उठी। बोली, ‘‘मेरे प्यारे बेटा, मैं तुमसे बहुत खुश हूं। बोलो, क्या चाहते हो ? जो मांगोगे वही दूंगी।’’ दोनों ने कहा, ‘‘माँ, हम वन में जाकर तप करना चाहतें है। आप अगर सचमुच कुछ देना चाहती हो, तो यह वर दो कि हम सदा तप करते रहे।’’
बेटों की बात सुनकर मां को बहुत दुख हुआ। अब उसके बेटे उससे बिछुड़ जायंगें। पर वे वचन दे चुकी थीं। उनको रोक नहीं सकती थीं। इसलिए वर देना पड़ा। वर पाकर दोनों भाई तप करने चले गये। वे सारे देश के वनों में घूमने लगे। घूमते-घूमते हिमालय पहाड़ के वनों में पहुंचे। इसी वन में अलकनन्दा के दोनों किनारों पर दों पहाड़ है। दाहिनी ओर वाले पहाड़ पर नारायण तप करने लगे। बाई और वाले पर नर। आज भी इन दोनों पहाड़ों के यही नाम है। यहां बैठकर दोनों ने भारी तप किया, इतना कि देवलोक का राजा डर गया। उसने उनके तप को भंग करने की बड़ी कोशिश की, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। तब उसे याद आया कि नर-नारायण साधारण मुनि नहीं है, भगवान का अवतार है। कहते है, कलियुग के आने तक वे वहीं तप करते रहें। आखिर कलियुग के आने का समय हुआ। तब वे अर्जुन और कृष्ण का अवतार लेने के लिए बदरी-वन से चले। उस समय भगवान ने दूसरे मुनियों से कहा, ‘‘मैं अब इस रूप में यहां नहीं रहूंगा। नारद शिला के नीचे मेरी एक मूर्ति है, उसे निकाल लो और यहां एक मन्दिर बनाओं आज से उसी की पूजा करना। यह मन्दिर बहुत पुराना है। लिखा हैं मुनियों ने मूर्ति को निकाला।
बद्रीधाम 
उसमें भगवान बदरीनारायण पद्मासन लगाये तप कर रहे है। आज भी मन्दिर में यही मूर्ति है। इसको रेशमी कपड़े और हीरे-जड़े गहने पहनाये जाते है। मन्दिर बहुत सुन्दर है। पैड़ियां चढ़कर जो दरवाजा आता है
, उसमें बहुत बढ़ियरा जालियां बनी है। ऊपर तीन सुनहरे कलश है। अन्दर चारो ओर गरुड़, हनुमान, लक्ष्मी और घण्टाकर्ण आदि की मूर्तिया है। फिर भीतर का दरवाजा है। अन्दर मूर्ति वाले कमरे का दरवाजा चांदी का बना है। उनके पास गणेश, कुबेर, लक्ष्मी, नर-नारायण उद्वव, नारद और गरूड की मूर्तिया है। यहां बराबर मंत्रों का पाठ, घंटों का शोर और भजनों की आवाज गूंजती रहती है। अखंड़ ज्योति भी जलती रहती है हम ठीक उसी समय पहुंचे जब आरती शुरू होने वाली थी। यहाँ के सभी पुजारी, जो रावलकहलाते है, दक्षिण के है। उनमे जो मुख्य है, उन्ही को मूर्ती पूजन और सजाने का अधिकार प्राप्त है। मुख्य रावल आरती से पहले मुख्य गर्भगृह का एक बाहरी चक्कर लगाते है और चारो दिशाओ पर बने चार दरवाजो के सामने चरणप्रक्षालन करते है। मेरी कल्पना में मुख्य रावल की छवि एक वृद्ध ज्ञानी पके हुए दाढ़ी-मूछों वाले व्यक्तित्व की थी। परन्तु उससे बिलकुल विपरीत देखने में 35-40 की उम्र के व्यस्क और चेहरे पर दाढ़ी-मूछ के नाम पर एक लेश मात्र तक ना था। पहनावा आकर्षित करने वाला था, एक गोल गेरुआ कानों को ढ़कने वाली टोपी, जांघो तक आती एक अचकन और नीचे पीतांबरी धोती थी।
मंदिर में दर्शन और चित्र लेने के बाद खाने का समय हो आगया था, थकान और ठण्ड दोनों बढ़ गयी थी खाना खाने के बाद हम रुकने का स्थान देख कर आराम से सो आगये और और अगले दिन सुबह अपनी प्राकृतवादी, अद्भुत और अनन्त अनोखे दृश्यों वाली यात्रा को समाप्त करके वापस अपने घर की दिशा में चल दिये।